प्रभारी बीईओ प्रकरण में कार्यालय में बुलाकर लिखित बयान लेने का आरोप, जांच की निष्पक्षता पर उठी उंगली

पत्थलगांव। प्रभारी बीईओ वेदानंद आर्य से जुड़े विभागीय जांच प्रकरण में अब कहानी का एक ऐसा पहलू सामने आया है, जिसने पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ा दी है। आरोप है कि विभागीय जांच से जुड़े कुछ संकुल शैक्षिक समन्वयकों को संबंधित अधिकारी के कार्यालय में बुलाकर उनके लिखित बयान लिए गए और पूर्व में जांच के दौरान सामने आए कथनों से अलग बयान लिखवाने के लिए दबाव बनाया गया।
आरोप यह भी है कि कुछ समन्वयकों से लिखित रूप में यह दर्ज कराया गया कि संबंधित अधिकारी द्वारा किसी प्रकार की राशि की वसूली नहीं की गई। बाद में इन कथित बयानों को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में प्रस्तुत कर पूर्व में सामने आए आरोपों को कमजोर करने की कोशिश किए जाने की बात कही जा रही है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन मामला विभागीय जांच से जुड़ा होने के कारण सवाल बेहद गंभीर है।
आखिर बयान बदला कैसे?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जांच के दौरान किसी साक्षी का बयान पहले दर्ज हो चुका है और बाद में उसी विषय पर अलग लिखित कथन सामने आता है, तो दोनों बयानों के बीच अंतर की वजह क्या है?
क्या बाद का बयान साक्षी ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से दिया?
क्या उस पर किसी तरह का दबाव था?
या फिर बाद का बयान पहले बयान की स्थिति को बदलने के लिए दिया गया?
इन सवालों का जवाब किसी अनुमान से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच से ही सामने आ सकता है।
28 अभियोजन साक्षी और बढ़ गई जांच की जिम्मेदारी
आयुक्त कार्यालय के अभिलेखों में विभागीय जांच के लिए 28 अभियोजन साक्षियों की सूची दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इनमें संकुल शैक्षिक समन्वयक, प्रधान पाठक और विभागीय कर्मचारी शामिल हैं।
जब इतने साक्षी जांच का हिस्सा हैं, तब किसी भी साक्षी के बयान में बदलाव या अंतर को सामान्य प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज करना जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर सकता है।
इसलिए जरूरी है कि सभी संबंधित साक्षियों के पहले और बाद के बयानों का आमने-सामने तुलनात्मक परीक्षण किया जाए।
जांच अधिकारी के सामने असली चुनौती
अब जांच की असली परीक्षा यही है कि आरोप किसके पक्ष में हैं या किसके खिलाफ, इससे ऊपर उठकर दस्तावेज और स्वतंत्र बयानों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए।
यदि बाद के बयान पूरी तरह स्वैच्छिक हैं, तो स्वतंत्र रूप से उनकी पुष्टि होनी चाहिए। यदि किसी साक्षी ने दबाव की बात कही है, तो उस पहलू की भी जांच होनी चाहिए।
साक्षियों के बयान संबंधित अधिकारी की मौजूदगी या प्रभाव से अलग वातावरण में दर्ज किए जाएं, तो जांच पर भरोसा और मजबूत होगा।
बिल, भुगतान और बयान—तीनों का मिलान जरूरी
पूरे मामले में केवल मौखिक बयानों पर निर्भर रहने के बजाय बिल-वाउचर, भुगतान रिकॉर्ड, विद्यालयवार सामग्री वितरण और अन्य दस्तावेजों का भी मिलान किया जाना जरूरी है।
दस्तावेज क्या कहते हैं और साक्षी क्या कहते हैं—जब दोनों का मिलान होगा, तभी तस्वीर साफ होगी।
अब निगाह शिक्षा विभाग पर
यह मामला किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने का है। आरोप सही हैं तो स्वतंत्र जांच में सामने आएंगे और गलत हैं तो भी उसी जांच से साफ हो जाएंगे।
लेकिन यदि साक्षियों के बयान को लेकर ही सवाल खड़े हो रहे हैं, तो विभाग के लिए सबसे जरूरी काम यही है कि साक्षियों को स्वतंत्र माहौल मिले और हर बयान की सत्यता की निष्पक्ष जांच हो।
अब देखना यह है कि विभाग इस संवेदनशील आरोप को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या 28 साक्षियों वाले इस प्रकरण में जांच को किसी प्रभाव से दूर रखकर वास्तविक तथ्य सामने लाए जाते हैं।
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प्रधान संपादक — धर्मेंद्र शर्मा
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