जशपुर जिले के इतिहास मैं पहली बार शिशु की निकली कावड़ यात्रा

सावन के पावन अवसर पर आदर्श शिशु वाटिका प्रभारी इंदिरा पटनायक एवं प्रधान प्राचार्य श्री संतोष कुमार पड़ी जी के द्वारा छोटे-छोटे शिशु जो कि शिशु वाटिका के हमारे छात्र छात्राएं हैं जिनके द्वारा कावड़ यात्रा भारी संख्या पर निकाली गई हमारे शिशु वाटिका से तथा शिशुओं के पालक द्वारा संपूर्ण व्यवस्था के साथ अपने शिशु को भेजा गया ताकि वह कावड़ यात्रा पर कावड़ लेकर जा सके और जाकर हमारे पत्थलगांव का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर श्री सत्यनारायण मंदिर (बड़ा मंदिर) नाम से विख्यात जिसमें हमारे शिव जी पर जाकर जल अर्पित कर सके और सबसे जरूरी बात यह कावड़ यात्रा पूरे शासकीय नियमों एवं यातायात नियमों को पालन करते हुए किया गया जिसमें पुलिस प्रशासन द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई जिसमें सारे शिशु का ध्यान अच्छे से रखा गया एवं गाड़ियों की गतिविधि पर अच्छी तरह से ध्यान रखा गया हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के शिक्षा मिशन के तहत जो कि आदर्श शिशु वाटिका खोला गया था जिसमें बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार का भी अध्ययन कराया जा रहा है ताकि समाज में आगे बढ़ाने में किसी भी प्रकार का उन्हें कष्ट ना हो तथा उनके गतिविधियों पर अच्छी तरह से ध्यान दिया जा रहा है ताकि उनका भविष्य प्रकाश से बाहर आ रहे |
कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर कई मान्यताएं और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रमुख भगवान परशुराम और श्रवण कुमार से संबंधित कथाएं हैं। यह यात्रा भगवान शिव को प्रसन्न करने और समुद्र मंथन से निकले विष से सृष्टि की रक्षा करने वाली शिव की स्तुति का एक महत्वपूर्ण अंग है। कांवड़ यात्रा की प्रमुख कथाएँ:
1. भगवान परशुराम की कथा:
मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहले गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लेकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित ‘पुरा महादेव’ में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। इसी के बाद से कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई।
2. श्रवण कुमार की कथा:
कुछ मान्यताओं के अनुसार, श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को हरिद्वार से गंगा स्नान कराकर वापस लाते समय अपने कांवड़ में गंगाजल भी भरकर लाया था, जिसे उन्होंने भगवान शिव का अभिषेक किया था, और इस प्रकार कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।
3. रावण की कथा:
शिव पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने पी लिया था, जिससे वे नीलकंठ कहलाए। इस विष के प्रभाव को शांत करने के लिए रावण ने कांवड़ में गंगाजल भरकर ‘पुरा महादेव’ में शिवजी का जलाभिषेक किया था, जिससे कांवड़ यात्रा का प्रचलन शुरू हुआ।

